Deepak Sahin Motivational Biography In Hindi

दोस्तों आज में आपको एक एसे ब्यक्ति के बारेमे बताने वाला हूँ जिसको आप लोग सुनके बहत चकित हो जाओंगे. अपना दो पैर खो कर भी हार नहीं मणि और अपनी जिन्दगी को बदलके रखदी. तो चलिए बात करते है दीपक साहिन के बायोग्राफी और पुरे जीबन के बारेमे.

दीपक साहिन बायोग्राफी

दोस्तों जब हमारे साथ कुछ गलत हो रहा होता है तो हम अपने अंदर के विचार बना लेते हैं कि भगवान आखिर हमारे साथ ही ऐसा क्यों करता है. दोस्तों अगर आपके मनमें एय बिचार आते है तो में दावे के साथ कह सकता हूं कि इस आर्टिकल के अंदर तक आपका जिंदगी की तरफ नजरिया बदल जाएगा. मैं आपको एक एसी इंसान की कहानी बताने जा रहा हूं. जीनोने श्रीफ २१ बर्स के उम्रोमे यह साबित कर दिया कि आपकी योग्यता किसी भी बीकलांगता से बहुत बड़ी है.

में बात कर रही हूँ सोलन में रहने वाले दीपक साहनी. जीनोने खूब मेहनत की और अपनी शुरू की हुई कंपनी को आज एक अलग ही मुकाम पर पहुंचा दिया है. इस आर्टिकल में मैंने आपको दीपक की जिंदगी का पूरा सफ़र बताऊंगा. दीपक का जन्म ८ अगस्त 1995 सोलन हिमाचल प्रदेश में पबन साहनी और सोनिया साहनी के घर हुआ. जब दीपक श्रीफ तिन महिके थे तब उन्हें निमोनिया हो गया.

उसके बाद उनकी फॅमिली दीपक को पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ हॉस्पिटल ले गए. जहाँ उनको एडमिट कर लिया गया और बाद में पता चला कि उनके स्पिमे पर तुमेर हो गया था और डॉक्टर ने तो यह तक कह दिया था इश तुमेर की वजह से उम्र सिर्फ 3 महीने के लिए अपनी जान को भी खतरा हो सकता है. यह बात सुनकर उनका परिवार काफी उदास हो गया था.

दीपक साहिन जीबन की कुछ बातें

दीपक को हर बड़े डॉक्टर के पास ले जाया गया और कहीं से कोई राहत नहीं मिल रही थी पर तभी उन्हें चाइल हिमाचल प्रदेश ले जाया गया लिया. जहाँ एक बाबाजी ने आयुर्बेदिक लेप दिया. इसको उनके लाइन पर रेगुलर लगाने से बो ख़तम होने लगा. इसके बाद उनका टुमेर तो ख़तम हो गया और उनके पैरों की प्रतिक्रिया होनी बंद हो गई.

कुछ सालो के बाद दीपक ने नार्मल बिद्याथ्री की तरह अपनी पढ़ाई शुरू करें. उनोने अपनी स्चूलिंग बिएल्सिपिएल से करी जहाँ उनकी सभी टीचर्स और खाश प्रिसिप्ले विना उने खूब सपोर्ट करती थी. दीपक पढाई में बहुत अच्छे थे उन्होंने 10th क्लास में स्कूल में स्कूल किआ. बो स्कूल व्हील चिर पर जाते थे. बो कुध्को कभी एय मेहेसुश नहीं होने दिया की बो दुसरे बचो की मुकाबले थोड़ी काम काबिल है. बल्कि दीपक हमेशा यही मानते हैं कि वह भी सक्स्यम हे जीने बाकि बचे है.

बो स्कूल में क्रिकेट खेला करते थे और उनके दोस्त बहत सपोर्ट करते थे. इसके बाद बो २०१३ में १२थ कलश में पूरा देश में इकॉनमी से टॉप किआ. एय उनके लिए बेहद गर्व की बार थी. उनके बाद बो श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में एडमिशन लेने का फैसला किया. पर तभी उनका मन चार्टर्ड अकाउंटेंट के तरफ ही था. तो उनोने इसी वजह से श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स को छोड़ कर हिमाचल प्रदेश कोर्स यूनिवर्सिटी से बीकॉम करा.

उनोने सीए की तयारी सुरु करदी और सभी टेस्ट को एक ही शोर्ट में क्लियर करते गए. दोस्तों बतादू किसी भी सीए के लिए क ही शोर्ट में करना न मुंकिन है. बो श्रीफ एक ही बार में कर दिखाए थे. इशी समय पर उन्हें एक आईडिया आया जिसपे बो काम करना चाहते है. बो एक पैकेज्ड फ़ूड प्रोदुसिंग कंपनी खोलना चाहते थे. उनका इश इश आईडिया के साथ एक अलग विज़न था.

दीपक इश के बारेमे और स्टडी करा उनोने अपना पहेला स्टार्ट उप की प्लान सुरु करदी. उनोने २ सालो तक पूरा स्टडी करा और अपनी महेनत से इशमें लग गए. साथ ही में बो कॉलेज की पढ़ाई किया करते थे फाइनल एग्जामिनेशन ने एकाउंटिंग में १०० से १०० नंबर रख कर और ८२ मार्क्स के सरह अपनी ग्रेजुएशन किआ.

उनोने उनके बाद अछि स्टार्ट उप की प्लानिंग की और सुच बुचके साथ उनोने अपनी कंपनी आधार फूड्स १ अप्रैल 2016 को शुरू करें. बो इश कंपनी में अदा, मैदा, बेशन, दलीय जैसे प्रोडक्ट्स बनाते थे. और उन्हीको पैक करके डिस्ट्रीब्यूट करते थे. सुरुयात में उनको कुछ मुल्किल का सामना करना पड़ा कनी की उनकी आने से पहेले ही बड़ी ब्रांच मध्य प्रदेश के मार्केट में पकड़ बना चुके थे. इश मुस्किल को आसन बनाने के लिए उनके पह एक उपाय था और बो था कंजूमर को एक्सितिंग ब्रांड प्रोडक्ट्स से अच्छा प्रोडक्ट कम कीमत में दो.

आखिर बातें दीपक के बारेमे

चाहे इसके लिए उन्हें शुरुआत में घटे ही क्यों ना झेलना पड़े. इश्के बाद कांसुमेर उनके प्रोडक्ट के ऊपर बिश्वाश करने लगे. फिरभी बो इसी कारण शुरुआती कुछ महीनों के नाम किया. उनसके बाद उनकी लगन और महेनत की कारन अधर फ़ूड की सेल बढ़ने लगी. एक बो दिन था और आज दिन है. कुछ १ सालो के अन्दर अपनी महेनत की वजह से १ सालके अनादर हिमाचल प्रदेश में आपना कंपनी खड़ा कर दिया.

एय काम क २१ बर्स उम्र की लड़के के लिए बहुत बात है. उनोने विकलांग होने के बावजूद किसी भी परिस्थिति में खुद को विकलांग और असक्सम मेहेसुश होने नहीं दिया. हर बार अपने लक्ष्य को हासिल किया. अभी दीपक एक सेल्फ डिपेंडेंट इंसान है. और बो ट्रांसलेटके लिए एक कार को कुढ़ भी ड्राइव करते है.

इसके बाद दीपक पीछे ना देखके आगे चलते गए और अपने साथ अपनी बनाया हुआ कंपनी को आगे लते गए. दोस्तों इससे हमको एय सिख मिलती है की जीबन में कभी हार नहीं माननि चाहिए. तभी हमको सक्सेस मिलेगी. इश आर्टिकल को आखिर तक पढने के लिए आपका बहत बहत धन्यवाद.

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